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सपनो के भारत के निर्माता

रात्रि को ठण्ड ने जब,
निर्बल शरीर को ठिठोर दिया,
फटी हुई चादर ओढ़कर,
पाँव सिकोड़ कर, कठोर तन कर ,
उसने अपने मन की ऊर्जा से,
बढ़ती ठण्ड को समेट लिया !

किरण फूटने से पहले वाली,
रेलगाड़ी ने जब सन्देश दिया,
छण भर में ही उसने अपना,
पूरा दिन भर देख लिया !

ईंट ईंट से उसने न जाने,
कितने भवनों को जोड़ दिया।
सड़क को, पुलिया को, और
नदियों को बांधो से घेर लिया !

छोटी सी दिहाड़ी कमाई पे,
महंगाई ने जब चोट किया,
कुछ रोटियों के साथ उसने
अपने सपनों को भी लपेट लिया !

इन्ही रोटियों की खातिर,
उसने अपने सपनो को भी बेच दिया।
शिछा से वंचित उसे, अन्धेर ने ,
अपने चपेट में ले लिआ !

थके हारे उस निर्बल शरीर को,
रात्रि में ठण्ड ने जब फिर से ठिठोर दिया।
उसी पुरानी चादर को फिर से उसने ओढ़ लिया।
सपनो के भारत में लगे, उस नवयुवक ने,
सपने देखना छोड़ दिया !!

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